तांगे वाले से मसाला किंग का सफर

MDH-7

महाशय धरमपाल हट्टी शायद आप इस नाम को नही जानते है, ये वही महाशय धरमपाल हट्टी है जिनके विश्‍य विख्‍यात मसाले आप अपने खाने में खाते है। M.D.H. नाम के प्रसिद्ध मसाला किंग।

दोस्‍तो सफलता युहीं नहीं मिल जाती है,सफलता के लिए बहुत मेहनत करती पड़ती है जैसे महाशय धरमपाल हट्टी जी ने की है। इनकी सफलता के पीछे भी बहुत बड़ा सघंर्ष छिपा हैं और इस सफलता के पीछे एक बहुत सघंर्ष भरी कहानी है। आईऐ जानते हैं उस सघंर्ष भरी कहानी को।

महाशय धरमपाल हट्टी का जन्म सियालकोट में हुआ जो आज के समय में पाकिस्‍तान में है। ये एक सामान्य परिवार से थे, इनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ज्‍यादा अच्छी नही थी, महाशय धरमपाल हट्टी को School में दाखिला कराया गया, लेकिन बचपन से ही पढ़ाई में बहुत कमजोर थे। इनका पढ़ाई में मन नही लगता था।

पिता के समझाने के बावजूद महाशय धरमपाल हट्टी बिल्कुल भी पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते थे,‍ पढ़ने में जरा भी ध्‍यान न होने के कारण पाँचवी कक्षा में वो Fail हो गये और इसी के साथ उन्होनें School जाना भी छोड़ दिया। पिता ने इनको कुछ काम सीखने के लिए एक दुकान पर भेज दिया।

कुछ दिन बाद इन्‍होने वह दुकान भी छोड़ दी और धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता गया। 15 साल की उम्र तक करीब 50 काम छोड़ चुके थे धरम पाल हट्टी।

सियालकोट लाल मिर्च के लिए बहुत प्रसिद्ध था, इसलिए इनके पिता जी ने इन्‍हे एक छोटी सी मसाले की दुकान खुलवा दी, धीरे-धीरे मसाले का व्यापार अच्छा चलने लगा, लेकिन उन दिनों आज़ादी के लिए आंदोलन अपने चरम पर था। 1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो सियालकोट को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया, इस कारण वहाँ रह रहे हिन्‍दू समुदाय के लोग असुरक्षा महसूस करने लगे, और दंगे भी काफ़ी तेज भड़क चुके थे। इस कारण से महाशय धरमपाल हट्टी के पूरे परिवार को सियालकोट छोड़ना पड़ा।

महाशय धरमपाल हट्टी के अनुसार चारों और बहुत भयानक स्थिती थी, सभी ओर मार-काट मची थी। लोग अपना पूरा बसा-बसाया घर-बार छोड़ कर भाग रहे थे।किसी तरह से महाशय धरमपाल हट्टी का पूरा परिवार बड़ी ही दिक्कतो के साथ भारत के नानक डेरा पहूंचे, लेकिन अभी वो शरणार्थी थे और अपना सब कुछ लूट चुका था।

महाशय धरमपाल हट्टी का पूरा परिवार कई मीलों पैदल चलकर अमृतसर (पंजाब, भारत) पहुंचा और पंजाब से वे अपने एक रिश्तेदार जो की दिल्ली में रहते थे, उनके यहाँ आ गए और उसके बाद महाशय धरमपाल हट्टी का पूरा परिवार करोलबाग दिल्‍ली आ गया। जब उनका परिवार दिल्‍ली आया उस समय उनके परिवार के पास केवल 1500 रुपये थे और कोई काम-काज भी नही था, लेकिन कुछ पैसे इक्‍कठा करके एक तांगा-घोड़ा खरीदा और इस तरह वो एक तांगा चालक बन गए।

लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था, करीब 2 महीने तक उन्होने कुतुब रोड दिल्ली पर तांगा-घोड़ा का काम किया और इसके बाद उन्हें लगा की वो तांगा-घोड़ा का काम नही कर पाऐंगे, लेकिन करते भी क्‍या? क्‍योंकि मसाले के सिवा वो कोई दूसरा काम जानते भी नहीं थे, कुछ सोचकर-विचार कर उन्होने घर पर ही मसाले पीसने और बेचने का काम चालु कर दिया। ईमानदारी और मसालों की शुद्धता की वजह से उनका कारोबार धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। माँग ज़्यादा होने के कारण मसाले अपने घर पर ना पीसकर एक व्यापारी के यहाँ चक्की पर पिसवाने लगे।

एक दिन अचानक ही महाशय धरमपाल हट्टी जब व्यापारी से मिलने गये तो उन्होने देखा कि वह मसालों में मिलावट कर रहा था, यह देखकर महाशय धरमपाल हट्टी को मन ही मन बहुत दुख हुआ और उन्होने खुद की मसाला पीसने की Factory लगाने का विचार बनाया और किर्तिनगर में इन्होने पहली Factory लगाई।

महाशय धरमपाल हट्टी ने उस दिन के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी Factory लगाई और इसी तरह से पूरे विश्व भर में अपने कारोबार को आगे बढ़ाया।

आज M.D.H. (महाशय धरमपाल हट्टी) एक बड़ा Brand बन चुका है और पूरे विश्व में इनका मसाला बिकता है। आज महाशय धरमपाल हट्टी बहुत बड़े उद्धयोग के मलिक हैं.

महाशय धरमपाल हट्टी एक समाज सेवक भी है, भारत में कई जगह इनके द्वरा स्‍थापित School और Hospital है।